अकबर इलाहाबादी: हाल-ए-दिल मैं सुना नहीं सकता

हाल-ए-दिल मैं सुना नहीं सकता लफ़्ज़ मा'ना को पा नहीं सकता इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता होश आरिफ़ की है यही पहचान कि ख़ुदी में समा नहीं सकता पोंछ सकता है हम-नशीं आँसू दाग़-ए-दिल को मिटा नहीं सकता मुझ को हैरत है उस की क़ुदरत पर अलम उस को घटा नहीं सकता हमारे यूट्यूब चैनल कोSubscribeकरें।

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Dec 09, 2025, 12:14 IST
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