आज का शब्द: लास और महादेवी वर्मा की कविता 'फिर विकल हैं प्राण मेरे!'

हिंदी हैं हम शब्द-शृंखला में आज का शब्द है - लास जिसका अर्थ है -1. एक प्रकार का ललित नृत्य 2. उछलकूद। कवयित्री महादेवी वर्मा ने अपनी कविता में इस शब्द का प्रयोग किया है। फिर विकल हैं प्राण मेरे! तोड़ दो यह क्षितिज मैं भी देख लूँ उस ओर क्या है! जा रहे जिस पंथ से युग कल्प उसका छोर क्या है क्यों मुझे प्राचीन बनकर आज मेरे श्वास घेरे सिंधु की निःसीमता पर लघु लहर का लास कैसा दीप लघु शिर पर धरे आलोक का आकाश कैसा दे रही मेरी चिरंतनता क्षणों के साथ फेरे! बिंबग्राहकता कणों को शलभ को चिर साधना दी, पुलक से नभ भर धरा को कल्पनामय वेदना दी; मत कहो हे विश्व 'झूठे हैं अतुल वरदान तेरे!' नभ डुबा पाया न अपनी बाढ़ में भी क्षुद्र तारे, ढूँढ़ने करुणा मृदुल घन चीर कर तूफान हारे; अंत के तम में बुझे क्यों आदि के अरमान मेरे! हमारे यूट्यूब चैनल कोSubscribeकरें।

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Dec 13, 2025, 11:52 IST
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