आज का शब्द: अकलुष और जानकीवल्लभ शास्त्री की कविता- फूलों का शृंगार बना दो तो जानूँ
'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- अकलुष, जिसका अर्थ है- कलुषता से रहित, निर्मल, शुद्ध, साफ़। प्रस्तुत है जानकीवल्लभ शास्त्री की कविता- फूलों का शृंगार बना दो तो जानूँ तीखे काँटों को फूलों का शृंगार बना दो तो जानूँ। वीरान ज़िन्दगी की ख़ातिर कोई न कभी मरता होगा, तपती सांसों के लिए नहीं यौवन-मरु तप करता होगा, फैली-फैली यह रेत। ज़िन्दगी है या निर्मल उज्ज्वलता निर्जल उज्ज्वलता को जलधर, जलधार बना दो तॊ जानूँ। मैं छाँह-छाँह चलता आया अकलुष प्रकाश की आशा में, गुमसुम-गुमसुम जलता आया : उजलूँ तो लौ की भाषा में। औंधा आकाश टँगा सर पर, डाला पड़ाव सन्नाटे ने, ठहरे गहरे सन्नाटे को झँकार बना दो तो जानूँ। हमारे यूट्यूब चैनल कोSubscribeकरें।
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Dec 09, 2025, 17:29 IST
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