Bengal: पहचान व ध्रुवीकरण की कोशिश के बीच, योजनाओं-वादों की होड़ में उलझी बंगाल की लड़ाई

इस बार बंगाल का चुनाव देश की राजनीति की दिशा तय करने वाला अहम मोड़ बनता जा रहा है। बीते एक दशक में बंगाल ने क्षेत्रीय बनाम राष्ट्रीय राजनीति की तीखी लड़ाई देखी है। सीएम ममता बनर्जी ने बंगाल की अस्मिता और स्थानीय पहचान को केंद्र में रखा, तो दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय नेतृत्व, विकास और डबल इंजन सरकार के नैरेटिव पर आगे बढ़ी। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, इस बार के नतीजे नैरेटिव, आंकड़े और रणनीति तीनों मिलकर तय करेंगे। पहचान की लड़ाई और ध्रुवीकरण की कोशिश के बीच लड़ाई योजनाओं और वादों के बीच सिमट गई है। ममता बनर्जी को सत्ता विरोधी लहर से जूझना पड़ेगा वर्ष 2021 का चुनाव पूरी तरह बाहरी बनाम बंगाल की बहस में बदल गया और तृणमूल भारी बहुमत के साथ सत्ता पर फिर काबिज हुई। मगर, मुकाबला उतना एकतरफा भी नहीं था। भाजपा ने 38 फीसदी वोट हासिल कर खुद को स्थापित प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित किया। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार भी चुनाव भावनात्मक व पहचान आधारित रहेगा या बेरोजगारी, कल्याण योजनाएं, भ्रष्टाचार और बूथ स्तर का गणित जैसे मुद्दे निर्णायक बनेंगे। तीसरी बार सत्ता में लौटने के लिए ममता को सत्ता विरोधी लहर, स्थानीय असंतोष व एसआईआर के बाद बदले सामाजिक समीकरणों से जूझना पड़ रहा है। हालांकि मुख्य मुकाबला योजनाओं और वादों के बीच सिमटा दिख रहा है। तृणमूल का फोकस लक्ष्मी भंडार योजना, छात्र-छात्राओं के लिए स्कॉलरशिप और ग्रामीण कल्याण योजनाओं पर है। वहीं, भाजपा बेरोजगारों व महिलाओं को 3000 प्रति माह भत्ता, सरकारी कर्मचारियों के लिए 7वां वेतन आयोग लागू करने, नौकरियों में महिलाओं की 33 फीसदी भागीदारी का वादा कर रही है। विश्लेषकों का मानना है कि करीब 49 फीसदी महिला वोट बैंक और लाभार्थी वर्ग इस बार भी निर्णायक रह सकता है। यही वर्ग 2021 में तृणमूल की जीत का बड़ा आधार बना था। इस बार भाजपा बाहरी नहीं, बल्कि राज्य में गहराई तक जमी हुई मुख्य विपक्षी ताकत है। भाजपा ध्रुवीकरण तो टीएमसी अल्पसंख्यकों, महिला वोटों पर निर्भर बंगाल की राजनीति में पहचान आधारित वोटिंग हमेशा से महत्वपूर्ण रही है। मुस्लिम वोट करीब 27-30% माने जाते हैं। उत्तर बंगाल में राजवंशी समुदाय का प्रभाव है, जबकि दार्जिलिंग और आसपास के क्षेत्रों में गोरखा वोट अहम भूमिका निभाते हैं। विश्लेषकों के मुताबिक, भाजपा की रणनीति ध्रुवीकरण पर आधारित बनी हुई है, जबकि तृणमूल अल्पसंख्यक, महिला और ग्रामीण वोटों के गठजोड़ पर भरोसा कर रही है। इस बार एंटी इन्कंबेंसी अहम फैक्टर है। तृणमूल ने असंतोष कम करने के लिए 70 से अधिक विधायकों के टिकट काटे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में तृणमूल ने 294 में से 213 से अधिक सीटें जीतीं, जबकि भाजपा 77 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी पार्टी बनी। पहली नजर में यह एकतरफा जीत दिखती है, लेकिन जनादेश का विश्लेषण करने पर पूरी तस्वीर ही अलग नजर आती है। तृणमूल का वोट शेयर 48% था, जबकि भाजपा का करीब 38 फीसदी था। भाजपा का वोट शेयर 28 फीसदी बढ़ा था। दोनों दलों के बीच अंतर 10 फीसदी का था। विश्लेषकों के अनुसार, 35 से 40 सीटें ऐसी थीं, जहां जीत का अंतर पांच हजार वोट से कम था। यानी एक-दो फीसदी वोट स्विंग से तस्वीर बदल सकती थी। चुनाव आयोग की ओर से कराए गए एसआईआर के दौरान करीब 91 लाख वोटर नाम हटाए गए हैं। 35 से अधिक सीटें इतने कम अंतर वाली हैं कि 1-2 फीसदी वोट स्विंग से भी सीटों की कुल संख्या में 15 से 25 सीटों का अंतर आ सकता है। चुनाव मैक्रो नैरेटिव से ज्यादा बूथ मैनेजमेंट और डाटा-आधारित रणनीति पर निर्भर करेगा।

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Apr 14, 2026, 05:28 IST
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