Una News: निजी स्कूलों की मनमानी से बढ़ा सरकारी सीबीएसई स्कूलों की ओर आकर्षण
ऊना। जिले में नए शैक्षणिक सत्र के साथ इस बार सरकारी सीबीएसई स्कूलों में दाखिले को लेकर अभिभावकों में जबरदस्त होड़ देखने को मिल रही है। पहले जहां अभिभावक बच्चों का दाखिला बड़े निजी स्कूलों में करवाने को प्राथमिकता देते थे, वहीं अब स्थिति बदलती नजर आ रही है। जिले के सरकारी सीबीएसई स्कूलों में सीटें सीमित होने के कारण कई स्थानों पर अभिभावकों को सुबह से ही कतारों में खड़ा होना पड़ रहा है।अभिभावकों का कहना है कि निजी स्कूलों की लगातार बढ़ती फीस, किताबों और वर्दी को लेकर मनमानी तथा हर वर्ष बढ़ते अतिरिक्त खर्चों ने उन्हें परेशान कर दिया है। यही कारण है कि अब वे सरकारी सीबीएसई स्कूलों को बेहतर विकल्प मान रहे हैं। इन स्कूलों में पढ़ाई का स्तर अच्छा होने के साथ-साथ फीस भी निजी स्कूलों की तुलना में काफी कम है। बताया जा रहा कि जिले के कई सरकारी सीबीएसई स्कूलों में निर्धारित सीटों से कहीं अधिक आवेदन पहुंच चुके हैं। कई स्कूलों में नर्सरी, पहली, छठी और नौवीं कक्षा में दाखिले के लिए सबसे अधिक भीड़ है। स्कूल प्रबंधन को भी अतिरिक्त व्यवस्थाएं करनी पड़ रही हैं। कुछ स्कूलों में आवेदन लेने के लिए अलग काउंटर बनाए गए हैं जबकि कई जगह पर स्टाफ को अतिरिक्त समय तक काम करना पड़ रहा है। जिले के सरकारी सीबीएसई स्कूलों में पिछले कुछ वर्षों में सुविधाओं में काफी सुधार हुआ है। स्मार्ट क्लासरूम, विज्ञान प्रयोगशालाएं, कंप्यूटर लैब, खेल मैदान और प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता के कारण इन स्कूलों में पढ़ाई का स्तर बेहतर हुआ है। अभिभावकों में राजेश कुमार, अमित कुमार, अरविंद कुमार, रणवीर सिंह, मनजीत कौर, पूजा देवी, कविता का कहना है कि जब सरकारी स्कूलों में अच्छी पढ़ाई और सीबीएसई पाठ्यक्रम की सुविधा कम खर्च में मिल रही है तो निजी स्कूलों पर अतिरिक्त खर्च करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। कई अभिभावकों ने यह भी कहा कि निजी स्कूलों की तुलना में सरकारी स्कूलों का वातावरण अधिक पारदर्शी और अनुशासित है। उपनिदेशक जिला प्रारंभिक शिक्षा विभाग सोमलाल धीमान ने बताया कि कोई भी संस्थान किताबों, वर्दियों व अन्य शैक्षिक सामग्री के लिए अभिभावकों को बाध्य नहीं कर सकता। अगर किसी स्कूल में इस तरह के मामले हैं तो शिक्षा विभाग से शिकायत करें। इस पर सख्त कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।फीस और अतिरिक्त खर्च बना बड़ा कारणअभिभावकों का कहना है कि निजी स्कूलों में केवल वार्षिक फीस ही नहीं बल्कि किताबें, वर्दी, परिवहन, गतिविधि शुल्क और अन्य मदों पर भी भारी खर्च करना पड़ता है। कई निजी स्कूल हर वर्ष फीस में बढ़ोतरी कर रहे हैं। इसके अलावा कई स्कूल अभिभावकों को केवल चिह्नित दुकानों से ही किताबें और वर्दी खरीदने के लिए बाध्य कर रहे हैं। इससे अभिभावकों को बाजार में मिलने वाले सस्ते विकल्पों का लाभ नहीं मिल पाता।अभिभावकों का आरोप है कि कुछ निजी स्कूलों ने किताबों और वर्दी के लिए विशेष दुकानों का चयन कर रखा है। स्कूल में दाखिले के बाद अभिभावकों को उसी दुकान पर भेजा जाता है, जहां सामान्य बाजार से अधिक कीमत वसूली जाती है। शिक्षा विभाग के पास पहुंच रहीं शिकायतेंनिजी स्कूलों द्वारा किताबों और वर्दी के लिए चिह्नित दुकानों पर भेजने के मामले लगातार शिक्षा विभाग तक पहुंच रहे हैं। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि स्कूल किसी भी अभिभावक को किसी एक दुकान से सामान खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। यदि ऐसा किया जा रहा है तो यह नियमों के विरुद्ध है। अभिभावक इसकी शिकायत संबंधित शिक्षा अधिकारी से कर सकते हैं।
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Apr 04, 2026, 17:56 IST
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