स्वास्थ्य: मन का भटकना केवल नकारात्मक ही नहीं, फायदेमंद भी; क्या आंतरिक ध्यान से बेहतर हो सकती है आपकी सेहत?

मानव मस्तिष्क का भटकना यानी माइंड वांडरिंग एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन जब यह भटकाव शरीर की संवेदनाओं जैसे सांस, दिल की धड़कन या अन्य आंतरिक संकेतों की ओर जाता है, तो इसका मानसिक स्वास्थ्य पर जटिल प्रभाव पड़ सकता है। प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज में प्रकाशित एक नए अध्ययन में पाया गया है कि जहां यह बॉडी वांडरिंग तत्काल नकारात्मक भावनाओं से जुड़ी हो सकती है, वहीं दीर्घकाल में यह एडीएचडी और डिप्रेशन के लक्षणों को कम करने में सहायक भी हो सकती है। डेनमार्क के आरहस विश्वविद्यालय के न्यूरोसाइंटिस्ट मिकाह एलेन के अनुसार अब तक अधिकतर शोध माइंड वांडरिंग के संज्ञानात्मक पहलुओं जैसे यादें, योजनाएं और सामाजिक संबंध पर केंद्रित रहे हैं। इन अध्ययनों से पता चलता है कि यह प्रक्रिया योजना बनाने, सीखने और रचनात्मकता जैसे मानसिक कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हालांकि, माइंड वांडरिंग का एक अन्य रूप, जिसमें ध्यान शरीर की आंतरिक संवेदनाओं पर जाता है, जिसे बॉडी वांडरिंग कहा जाता है, अब तक काफी हद तक नजरअंदाज किया गया था। 536 प्रतिभागियों पर अध्ययन किया गया एलेन और उनकी टीम ने 536 प्रतिभागियों पर अध्ययन किया, जिन्हें मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग (एमआरआई) स्कैनर में स्थिर लेटाया गया। इसके बाद उनसे पूछा गया कि स्कैन के दौरान उनके मन में क्या चल रहा था। प्रतिभागियों ने न केवल सामान्य विचार जैसे यादें, योजनाएं और सामाजिक बातचीत बताए, बल्कि शरीर से जुड़ी संवेदनाओं जैसे सांस, दिल की धड़कन और मूत्राशय पर ध्यान देने की भी जानकारी दी। कनाडा के वाटरलू विश्वविद्यालय के न्यूरोसाइंटिस्ट डैनियल स्माइलक का कहना है कि यह अध्ययन माइंड वांडरिंग के एक नए और दिलचस्प पहलू को सामने लाता है। हालांकि, वे यह भी जोड़ते हैं कि एमआरआई जैसे सीमित वातावरण के बाहर, दैनिक जीवन की विभिन्न गतिविधियों के दौरान बॉडी वांडरिंग का अध्ययन करना और अधिक उपयोगी होगा। तत्काल प्रभाव: नकारात्मक अनुभव प्रश्नावली के परिणामों से यह सामने आया कि जिन प्रतिभागियों ने अधिक बॉडी वांडरिंग की सूचना दी, उन्होंने एमआरआई के दौरान अधिक नकारात्मक भावनाएं महसूस की। अध्ययन की सह-लेखिका लीया बनेलिस का कहना है कि यह नकारात्मक अनुभव एमआरआई स्कैनर के सीमित और बंद वातावरण के कारण भी हो सकता है। हालांकि, 2024 के एक अन्य अध्ययन में, जिसमें प्रतिभागियों ने दिनभर स्मार्टफोन के जरिये अपने अनुभव दर्ज किए, यह पाया गया कि शरीर पर अधिक ध्यान देना सामान्य परिस्थितियों में भी नकारात्मक मूड से जुड़ा हो सकता है। दीर्घकालिक लाभ: डिप्रेशन में कमी इसके विपरीत, जिन प्रतिभागियों में कुल मिलाकर बॉडी वांडरिंग की प्रवृत्ति अधिक थी, उनमें डिप्रेशन और एडीएचडी के लक्षण अपेक्षाकृत कम पाए गए। पहले के अध्ययनों में इन दोनों स्थितियों को पारंपरिक माइंड वांडरिंग के उच्च स्तर और इंटरसेप्शन यानी शरीर की आंतरिक संवेदनाओं को महसूस करने की क्षमता में कमी से जोड़ा गया है। शोधकर्ताओं का मानना है कि शरीर के संकेतों के प्रति जागरूकता व्यक्ति को नकारात्मक सोच के चक्र से बचाने में मदद कर सकती है।

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Apr 06, 2026, 06:13 IST
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