Una News: बिनौला खल के दाम 5000 रुपये प्रति क्विंटल पार, पशुपालकों की बढ़ी चिंता
बडूही (ऊना)। क्षेत्र में बिनौला खल (कॉटनसीड खल) के दामों ने इस बार सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। बाजार में इसकी कीमत 5000 रुपये प्रति क्विंटल के ऊपर पहुंच गई है जिससे पशुपालकों पर आर्थिक बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। हालात ऐसे हो गए हैं कि अब पशुओं को बिनौला खल डालना कई लोगों के लिए मुश्किल बन गया है। पिछले महीने इसके भाव करीब 4500 रुपये प्रति क्विंटल थे लेकिन एक ही महीने में 500 रुपये से अधिक की बढ़ोतरी ने पशुपालकों की आय पर सीधा असर डाला है। जानकारों के अनुसार बिनौला खल की कीमतों में इस भारी उछाल के पीछे कई कारण हैं। इस वर्ष कम पैदावार और असमय बारिश के कारण कपास की फसल को काफी नुकसान हुआ, जिससे आपूर्ति घट गई। वहीं खाड़ी देशों में तनावपूर्ण हालातों के चलते वैश्विक स्तर पर तेल और तिलहन की सप्लाई प्रभावित हुई है। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ी हैं जिसका सीधा असर स्थानीय बाजारों पर भी पड़ा है। इसके अलावा माल ढुलाई (ट्रांसपोर्ट) के खर्च में बढ़ोतरी और उर्वरकों के महंगे होने से उत्पादन लागत भी बढ़ी है। भारत में डेयरी उद्योग की बढ़ती मांग के मुकाबले आपूर्ति कम होने से कीमतों में और तेजी आई है। कीमतों में भारी बढ़ोतरी के चलते अब पशुपालक गेहूं का दर्ड, सरसों खल और अन्य पशु आहार का उपयोग कर रहे हैं। इससे बाजार में बिनौला खल की मांग और बिक्री में भी कमी दर्ज की जा रही है।बिनौला खल, कपास (कॉटन) के बीज से तैयार की जाती है। भारत में कपास का उत्पादन मुख्य रूप से गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में होता है। इनमें गुजरात देश का सबसे बड़ा कपास उत्पादक राज्य माना जाता है। पशु चिकित्सालय चुरुडू के डॉ. मोहित कुमार का कहना है कि दुधारू पशुओं के लिए खल बहुत जरूरी होती है लेकिन अगर पशु पालक अपने घर में मोटा अनाज गेहूं, मक्की, चौकर, थोड़ी मात्रा में खल, गुड़ आदि का संतुलित मिक्सर बनाकर पशुओं को दें तो काफी हद तक राहत मिल सकती है। चुरुडू से किसान व डेयरी संचालक संदीप ठाकुर ने बताया कि पहले नियमित रूप से पशुओं को बिनौला खल देते थे लेकिन अब इसके दाम इतने ज्यादा हो गए हैं कि इसे खरीदना मुश्किल हो गया है। दूध से होने वाली आमदनी इतनी नहीं है कि खर्च आसानी से निकल सके, इसलिए अब पशुओं को कम मात्रा में खल दी जा रही है। टकारला के पशुपालक वनीत शर्मा का कहना है कि उन्होंने बिनौला खल की जगह गेहूं का दर्ड और अन्य पशु आहार का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। मजबूरी में विकल्प ढूंढने पड़ रहे हैं क्योंकि खर्च लगातार बढ़ रहा है।स्थानीय दुकानदार सतीश मेहता ने बताया कि पहले बिनौला खल की बिक्री अच्छी रहती थी लेकिन अब ग्राहक कम हो गए हैं। लोग या तो कम मात्रा में खरीद रहे हैं या फिर पूरी तरह विकल्पों की ओर जा रहे हैं। खन्ना (पंजाब) के थोक विक्रेता कमलजीत सिंह ने बताया कि इस बार सप्लाई काफी कम है और ट्रांसपोर्ट व आयात खर्च भी बढ़ गया है। अंतरराष्ट्रीय हालातों का सीधा असर कीमतों पर पड़ रहा है इसलिए दाम बढ़ना स्वाभाविक है।
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Apr 04, 2026, 17:57 IST
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