तमिलनाडु: 75 साल पुरानी DMK, 50 साल की AIADMK बनाम दो साल की TVK; 234 सीटों पर आज किसके साथ खड़ी होगी जनता

तमिलनाडु में सियासत का राजदंड द्रविड़ राजनीति के इर्द गिर्द घूमता है। यह वह राज्य है, जहां राजनीति का वेलफेयर मॉडल, मतलब योजनाओं की फेहरिस्त हार और जीत की लंबाई तय करती है, जबकि गठबंधन रेमडेसिवीर का काम करता है। इस बार चुनावी मैदान में पारंपरिक ढांचे के बीच नए चेहरे और बंटते वोट का संक्रमण इस क्रोनोलॉजी को चुनौती दे रहा है। 75 साल पुरानी पार्टी द्रमुक और 50 साल पुरानी पार्टी अन्नाद्रमुक से 2 साल पुरानी पार्टी टीवीके का मुकाबला है। राज्य में पंचकोणीय मुकाबला 234 सीटों का चुनाव हमेशा की तरह द्रमुक बनाम अन्नाद्रमुक नहीं है। विजय की पार्टी टीवीके व सीमान के अलावा भाजपा भी मुकाबले में है। नतीजन वोट का मार्जिन कम होगा। 30-35% वोट शेयर में भी सीट फतह हो जाए, तो हैरानी नहीं होगी। पलानीस्वामी ने 2011 में एक लाख के अंतर से चुनाव जीता था, वहीं पेरियासामी ने 2021 में 1.35 लाख से ज्यादा वोट पाए थे। यह राज्य में जीत के सबसे बड़े अंतर के तौर पर दर्ज है। 2006 में मायलापोर सीट पर सबसे कम 32 वोटों के अंतर से जीत-हार तय हुई थी। 2021 में टी नगर में हार-जीत का अंतर सिर्फ 137 वोट था। राज्य की चार सीटें ऐसी हैं, जिसके बारे में कहा जाता है कि जिस पार्टी का उम्मीदवार यहां जीतेगा, उसी की सरकार बनेगी। 1957 से वेसंदूर व श्रीपेरांबूर और 1977 से शोलावंदन और रामनाथपुरम ऐसी वेलबेदर सीटें रहीं हैं। यह भी पढ़ें - 'परिवर्तन' बनाम 'जीतबे बांग्ला': बंगाल में पहले चरण के तहत 152 सीटों पर वोटिंग आज, मैदान में 1478 उम्मीदवार वरिष्ठ पत्रकार टी रामकृष्णन कहते हैं, इस बार स्टालिन को लेकर एंटी इन्कंबेंसी नहीं है। विपक्ष बंटा हुआ है, लेकिन सरकार किसी बनेगी, यह पार्टियों का फॉर्मूला तय करेगा। शायद यही वजह है कि स्टालिन ने स्विगी-जोमैटो की तरह पार्टियों को अपने साथ जोड़ा है। उनके साथ वह पार्टियां भी आ गई हैं जिन्हें गठबंधन में एक भी सीट नहीं मिली। यह जयललिता-करुणानिधि के बाद पहली पीढ़ी का पहला विधानसभा चुनाव भी है। यानी नई लीडरशिप की अग्निपरीक्षा। तमिलनाडु के पढ़े-लिखे और समझदार वोटर्स स्थायी सरकार चाहते हैं। परिवारवाद, अहंकारजानिये उन मुद्दों को जो तय करेंगे रुख राज्य में भ्रष्टाचार से बड़ा मसला परिवारवाद और सियासत में अहंकार है। भाजपा दक्षिण फतह करने के लिए राज्य में मौजूदगी चाहती है। अन्नाद्रमुक विपक्ष से पक्ष के लिए भाजपा की मदद ले रही है। डीएमके का चुनाव भाजपा को राज्य से दूर रखने के लिए लड़ रही है। टीवीके पहले ही चुनाव में किला फतह करने का ख्वाब लिए है। ओबीसी तमिलनाडु की सियासत की सबसे अहम वर्ग है। यह कई ताकतवर जातियों का समीकरण है, जहां वानियार संख्या से, गाउंडर आर्थिक ताकत से और मुथरैयार स्थानीय प्रभाव से चुनावी नतीजों को दिशा देते हैं। जितने भी सीएम आए, उन्होंने अलग-अलग जातियों को ओबीसी की लिस्ट में जोड़ने के काम किया। ज्यादातर सीएम इसी वर्ग से हैं। अन्नादुराई, एमजीआर, करुणानिधि, जयललिता, पनीरसेल्वम, पलानीस्वामी से स्टालिन तक सभी ओबीसी से आते हैं। जाति देश में हर इलाके में चलती है, लेकिन तमिलनाडु में जाति से पहले पार्टी अहम हो जाती है। अन्नाद्रमुक के हिस्से एंटी इन्कंबेंसी वाले वोट आएंगे। इसमें विजय की पार्टी टीवीके की भी हिस्सेदारी होगी। वोट परसेंटेज 70ः30 या 60ः40 हो सकता है। टीवीके के हिस्से इसके अलावा फर्स्ट टाइम वोटर और 3.24 करोड़ महिला वोटर का बड़ा भाग भी होगा। शशिकला के वोट बैंक में अन्नाद्रमुक के हिस्से में से कुछ और पलानीस्वामी के विरोधियों के वोट होंगे। वहीं, सीमान को मिलने वाले वोट में तमिल मुद्दे और एंटी डीएमके-अन्नाद्रमुक के वोट सबसे ज्यादा होंगे। 15 साल में दोगुने हो गए उम्मीदवार राज्य में 15 वर्षों में उम्मीदवार दोगुने हो गए हैं। इस बार 4600 उम्मीदवार मैदान में हैं और यह अब तक का सर्वाधिक उम्मीदवारों वाला चुनाव है। 2011 में 2748 उम्मीदवार मैदान में थे। 2021 में 3998 और 2016 में 3776 प्रत्याशी चुनाव लड़े थे। तमिलनाडु चुनाव मेंनिर्दलीयों का जोर कई सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों की बड़ी संख्या चुनाव परिणाम को प्रभावित करेगा। चेन्नई की कई सीटों पर 70 प्रतिशत उम्मीदवार निर्दलीय हैं। करूर सीट पर 10 में से 8 निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। 1996 में मोदकुरीची से 1033 उम्मीदवारों ने पर्चा भरा था। आयोग ने चुनाव ही निरस्त कर दिए थे। यह भी पढ़ें - पीएम मोदी को झालमुड़ी देने वाले विक्रम शॉ कौन: SPG कमांडर बताने का दावा हुआ फुस्स, दुष्प्रचार का पर्दाफाश पैसा और सोना - चुनाव प्रभावित करने की जड़ तमिलनाडु कैश के जरिए चुनाव पर असर डालने को लेकर काफी बदनाम है। 26 फरवरी से आचार संहिता लागू होने से अब तक 543 करोड़ रुपये के कैश और सोना समेत अन्य सामान जब्त हुए हैं। 2016 में आराकुरिची व थंजावुर में पैसे बांटने के आरोप के बाद चुनाव टालने पड़े थे। 2019 में वेल्लोर का चुनाव तक रद्द करना पड़ा।

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Apr 23, 2026, 05:08 IST
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