सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: अग्रिम जमानत भले खारिज करें, पर सरेंडर का आदेश नहीं दे सकतीं अदालतें
देश की सर्वोच्च अदालत ने अग्रिम जमानत और अदालती क्षेत्राधिकार को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी भी आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज करना अदालत का अधिकार है। हालांकि, याचिका खारिज करते समय अदालत के पास यह शक्ति नहीं है कि वह आरोपी को संबंधित ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण करने का निर्देश दे। सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की खंडपीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। यह मामला धोखाधड़ी और जालसाजी के आरोपी एक व्यक्ति की ओर से दायर की गई विशेष अनुमति याचिका से जुड़ा था। पीठ ने सुनवाई के दौरान न्यायिक सीमाओं के बारे में बात की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि अदालत अग्रिम जमानत खारिज करना चाहती है, तो वह ऐसा कर सकती है। लेकिन अदालत के पास यह कहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है कि याचिकाकर्ता अनिवार्य रूप से सरेंडर करे। झारखंड से जुड़ा है मामला यह पूरा मामला झारखंड हाईकोर्ट के एक पुराने आदेश से उपजा था। हाई कोर्ट ने भूमि विवाद से संबंधित एक मामले में आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया था। याचिका खारिज करने के साथ ही हाई कोर्ट ने आरोपी को निर्देश दिया था कि वह निचली अदालत के सामने आत्मसमर्पण करे और नियमित जमानत के लिए आवेदन करे। पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत दर्ज कराई गई थी। इसमें आरोपी पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे। इनमें धारा 323 यानी स्वेच्छा से चोट पहुंचाना, 420-धोखाधड़ी, 468 यानी धोखाधड़ी के उद्देश्य से जालसाजी और 471-जाली दस्तावेज का उपयोग शामिल हैं। यह भी पढ़ें:'ए लड़का, कोई तमाशा नहीं करेगा':रवि किशन के रोड शो में घुसे TMC कार्यकर्ता, भाजपा सांसद ने ऐसे संभाले हालात झारखंड हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था अग्रिम जमानत याचिका झारखंड हाईकोर्ट ने आरोपी की दूसरी अग्रिम जमानत याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया था कि मामले में कोई नई परिस्थितियां सामने नहीं आई हैं। हाईकोर्ट ने अपने पिछले आदेश पर भरोसा जताया था। उस आदेश में अदालत ने सतेंदर कुमार अंतिल बनाम सीबीआई मामले के फैसले का हवाला देते हुए आरोपी को ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करने को कहा था। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस दृष्टिकोण को गलत ठहराया। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस तरह का निर्देश पूरी तरह से क्षेत्राधिकार के बिना दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने साफ-साफ कहा कि अग्रिम जमानत का उद्देश्य गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान करना है। यदि अदालत को लगता है कि राहत नहीं दी जानी चाहिए, तो वह याचिका को अस्वीकार कर सकती है। लेकिन वह आरोपी पर आत्मसमर्पण का दबाव नहीं बना सकती।
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Apr 26, 2026, 14:30 IST
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