मंगल अभियान: जापान ने अंतरिक्ष में उड़ाया नई पीढ़ी का इंजन, घटाया जा सकता है भविष्य के अभियानों की लागत

जापान ने भविष्य के मंगल अभियानों को अधिक हल्का, किफायती और दक्ष बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए अंतरिक्ष में नई पीढ़ी के रोटेटिंग डेटोनेशन इंजन का सफल परीक्षण किया है। जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी जाक्सा और जापानी विश्वविद्यालयों की ओर से विकसित इस प्रायोगिक इंजन ने वास्तविक अंतरिक्ष वातावरण में तरल एथेनॉल और नाइट्रस ऑक्साइड के साथ सफलतापूर्वक काम किया। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह तकनीक पारंपरिक रॉकेट इंजनों की तुलना में कम जगह में अधिक शक्ति पैदा कर सकती है, जिससे भविष्य के ग्रह अभियानों का भार और लागत दोनों घटाई जा सकती हैं। जाक्सा के अंतर्गत काम करने वाले इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस एंड एस्ट्रोनॉटिकल साइंस (आईएसएएस) के अनुसार, यह परीक्षण नवंबर 2024 में किया गया था, लेकिन मिशन से प्राप्त तकनीकी आंकड़ों के विस्तृत विश्लेषण और सत्यापन के बाद अब इसके परिणामों को प्रमुखता से सार्वजनिक किया गया है। यह परीक्षण लॉन्च किए गए साउंडिंग रॉकेट एस-520-34 के जरिये किया गया। अंतरिक्ष में 438 न्यूटन का थ्रस्ट हासिल मिशन के दौरान रॉकेट ने शुरुआत में पारंपरिक ठोस ईंधन प्रणाली का उपयोग किया। इसके बाद डीईएस2 इंजन को सक्रिय किया गया।इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस एंड एस्ट्रोनॉटिकल साइंस (आईएसएएस) के अनुसार इंजन ने अंतरिक्ष में 438 न्यूटन का थ्रस्ट उत्पन्न किया। यह इस बात का महत्वपूर्ण प्रमाण माना जा रहा है कि तरल प्रणोदकों के साथ डेटोनेशन आधारित दहन को पृथ्वी के बाहर वास्तविक उड़ान परिस्थितियों में नियंत्रित तरीके से संचालित किया जा सकता है। यह भी पढ़ें:ऐतिहासिक संयोग और भाषाओं का समाजशास्त्र:ट्रंप और चार्ल्स के बीच संवाद ने खींचा दुनिया का ध्यान इंजन डिजाइन को बनाया गया अधिक सरल जापानी वैज्ञानिकों ने इस संस्करण में इंजन की संरचना में भी बड़ा बदलाव किया। पहले इस्तेमाल किए गए डबल-सिलेंडर मॉडल की जगह इस बार सिंगल-सिलेंडर डिजाइन अपनाया गया। इससे इंजन को अधिक सरल बनाने और आंतरिक कूलिंग से जुड़ी समस्याओं को कम करने की कोशिश की गई। नागोया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता जिरो कसाहारा के अनुसार, अत्यधिक तापमान सहने योग्य बनाने पर काम जारी है। मंगल मिशनों के लिए हल्की तकनीकों पर जोर इस मिशन में आरएटीएस2 नामक एक इनफ्लेटेबल एरोशेल प्रणाली का भी परीक्षण किया गया। एरोशेल ऐसी संरचना होती है, जो किसी अंतरिक्ष यान को ग्रह के वातावरण में प्रवेश के दौरान धीमा करने में मदद करती है।मंगल ग्रह के मामले में यह चुनौती अधिक कठिन मानी जाती है, क्योंकि वहां का वातावरण पृथ्वी की तुलना में बेहद पतला है। पतले वातावरण के कारण पर्याप्त वायु प्रतिरोध नहीं बन पाता, जिससे लैंडिंग जटिल हो जाती है। आरएटीएस प्रणाली में एक फुलने वाली संरचना का उपयोग किया गया, जो वातावरण में प्रवेश के दौरान हवा के संपर्क क्षेत्र को बढ़ाती है। इससे ड्रैग यानी वायु प्रतिरोध बढ़ता है और अंतरिक्ष यान की गति कम करने में मदद मिलती है। अन्य वीडियो-

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: May 11, 2026, 06:14 IST
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