स्वाद, संतुष्टि और विज्ञान: चेतना को प्रभावित करता है भोजन, पसंदीदा खाना कराता है खुशी का अनुभव
क्या आपने अपने पसंदीदा भोजन से मिलने वाली संतुष्टि को महसूस किया है। यह संतुष्टि हमेशा नहीं मिल सकती, क्योंकि जब आप घर में होते हैं, तो जरूरी नहीं कि रोज आपकी ही पसंद का भोजन तैयार हो। फिर भी, सोचकर देखें कि खाने की जो चीजें परम संतुष्टि देती हों, अगर इन्सान को सिर्फ वही खाने को मिलें, तो उसके मनोविज्ञान पर क्या असर होगा इस सवाल का जवाब ढूंढने से पहले, जरा भोजन और दिमाग के संबंधों से जुड़ी कुछ बुनियादी बातें समझ लें। सदियों तक विज्ञान ने हमें केवल एक ही बात सिखाई है कि हमारा मस्तिष्क ही सब कुछ है। वहीं यादें जन्म लेती हैं, वहीं भावनाएं आकार लेती हैं और वहीं से विचार भी निकलते हैं। इसीलिए, दिमाग को शरीर का कंट्रोल रूम कहा गया है। पर क्या यह पूरी तरह सच है उस पल को याद कीजिए, जब आप गहरे डर में होते हैं, तो दिल की धड़कन तेज हो जाती है, सांसें उखड़ने लगती हैं और पेट में कुलबुलाहट होने लगती है क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है अगर सारी भावनाएं दिमाग में उपजती हैं, तो पेट की इसमें क्या भूमिका है असल में, यहीं से शुरू होती है एक नई समझ-एक ऐसा सच, जिसे विज्ञान अब धीरे-धीरे स्वीकार कर रहा है, पर भारतीय दर्शन उसे सदियों पहले महसूस कर चुका था। दरअसल, इसका संबंध हमारे भोजन से है। जब कभी हमें मनपसंद भोजन मिलता है, चाहे वह मां के हाथों का बना दाल-चावल हो, कोई मिठाई हो या किसी खास व्यंजन का स्वाद, तो हमारे भीतर एक अलग ही खुशी व गहरी संतुष्टि जन्म लेती है। यह केवल स्वाद का आनंद नहीं होता, बल्कि मन और हमारी चेतना को छूने वाला अनुभव होता है। भारतीय दर्शन और आधुनिक शोध, दोनों सहमत हैं कि भोजन हमारी चेतना को प्रभावित करता है। तभी तो कहा गया है-जैसा अन्न, वैसा मन। वास्तव में, इसके पीछे एक पूरा विज्ञान काम कर रहा होता है। न्यूट्रिशनल साइंस (पोषण विज्ञान) कहता है कि हमारा दिमाग कुल शारीरिक ऊर्जा का लगभग 20 से 25 प्रतिशत उपयोग करता है। यानी हम जो भी खाते हैं, उसका सीधा असर हमारी सोच, एकाग्रता और हमारे मूड पर पड़ता है। इसलिए, जब हम पौष्टिक व मनपसंद भोजन करते हैं, तो हमारे पाचन तंत्र में रहने वाले खरबों सूक्ष्मजीव इस भोजन से संवाद करते हैं। मनपसंद आहार पाकर वे भी खुश हो जाते हैं, और तंत्रिकाओं के जरिये मस्तिष्क को खुशी का संकेत भेजते हैं, जिससे मन प्रसन्न हो जाता है। अब इस कहानी में एक और दिलचस्प मोड़ आता है, वह है हमारा पेट। विज्ञान की एक नई शाखा, न्यूट्रिशनल साइकियाट्री, बताती है कि हमारा पेट सिर्फ पाचन अंग ही नहीं, बल्कि हमारे मन का नियंत्रक भी है। वास्तव में, हमारे शरीर में एक नायाब संपर्क होता है, जिसे गट-ब्रेन एक्सिस कहा जाता है। यानी हमारा पेट और दिमाग लगातार एक-दूसरे से संवाद करते रहते हैं। जब हम अपनी पसंद का खाना खाते हैं, तो हमारे मस्तिष्क में एक खास रासायनिक प्रक्रिया शुरू हो जाती है। ऐसे भोजन से पेट में मौजूद सूक्ष्मजीव, जिन्हें गट माइक्रोबायोम कहा जाता है, सेरोटोनिन और डोपामाइन जैसे फील गुड हार्मोंस बनाते हैं, जो सीधे हमारे दिमाग को प्रभावित करते हैं। हैरानी की बात है कि शरीर का लगभग 90 प्रतिशत सेरोटोनिन पेट में ही बनता है, जो हमें खुशी, संतुलन और मानसिक शांति का अनुभव कराता है। यानी जब आप पसंदीदा और पौष्टिक भोजन करते हैं, तो आपका पेट खुश हो जाता है और यह खुशी सीधे आपके दिमाग तक पहुंचती है। पर, जब आप तनाव में होते हैं, तो शरीर कॉर्टिसोल नामक हार्मोन छोड़ता है। यह आपको तुरंत ऊर्जा देने वाली चीजों की ओर खींचता है-जैसे चिप्स या जंक फूड। इसे इमोशनल ईटिंग कहा जाता है। यह एक जाल है। ऐसे भोजन से बेशक थोड़ी देर के लिए राहत मिलती है, पर लंबे समय में यह मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है। तो क्या मनपसंद भोजन सच में हमें खुश कर सकता है या खुश लोग ही अच्छा भोजन चुनते हैं इसका जवाब खोजने के लिए 2017 में एक महत्वपूर्ण प्रयोग किया गया। इसमें 67 अवसाद पीड़ितों को दो समूहों में बांटा गया। पहले समूह को मेडिटेरेनियन डाइट अपनाने के लिए कहा गया, जिसमें ताजे फल, सब्जियां, साबुत अनाज, नट्स और कम प्रोसेस्ड फूड शामिल थे। दूसरे समूह को केवल भावनात्मक समर्थन दिया गया और उनके खाने में कोई बदलाव नहीं किया गया। 12 हफ्तों बाद परिणाम चौंकाने वाले थे। पहले समूह के लगभग एक-तिहाई लोग अवसाद से बाहर आ चुके थे, जबकि दूसरे समूह में यह संख्या केवल आठ प्रतिशत थी। यानी सिर्फ खाने की आदत बदलने से मानसिक स्थिति में बड़ा बदलाव आ सकता है। अग्रणी वैज्ञानिक डॉ. फेलिस जैका के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य एक जटिल विषय है और केवल सलाद खाना हर मर्ज की दवा नहीं है, पर भोजन में किए गए छोटे बदलाव भी मन को पटरी पर लाने में जादुई भूमिका निभा सकते हैं। क्या आपने कभी गौर किया है कि भूखे होने पर आप ज्यादा चिड़चिड़े हो जाते हैं ऐसी स्थिति को हैंगर कहा जाता है, यानी हंगर (भूख) और एंगर (गुस्सा) का मेल। यह कोई इत्तेफाक नहीं है। दरअसल, जब रक्त में शर्करा का स्तर गिरता है, तो मस्तिष्क इसे आपातकालीन स्थिति मान लेता है और तनाव के संकेतों को बढ़ा देता है। ऐसे में, भूख महज पेट की पुकार नहीं, बल्कि तीव्र भावनात्मक प्रतिक्रिया बन जाती है। यहीं से डाइट और कंट्रोल का खेल (डाइटिंग) शुरू होता है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जब हम खुद को कड़े नियमों में बांधकर खाने पर प्रतिबंध लगाते हैं, तो अनजाने में ही मानसिक तनाव को बढ़ा रहे होते हैं। 1940 के दशक में किया गया मिनेसोटा स्टार्वेशन एक्सपेरिमेंट इसका जीवंत उदाहरण है। इसमें स्वस्थ व शांत स्वभाव के पुरुषों को बहुत कम भोजन पर रखा गया। नतीजतन, वे हिंसक, चिड़चिड़े और भोजन के प्रति जुनूनी हो गए। उनकी मानसिक शांति पूरी तरह भंग हो गई। आधुनिक शोध भी इसी ओर इशारा करते हैं कि जो लोग इंट्यूटिव ईटिंग अपनाते हैं, यानी शरीर की जरूरत व संकेतों के अनुसार खाते हैं, वे ज्यादा संतुष्ट और खुश रहते हैं। रही बात हरदम पसंदीदा भोजन खाने से संतुष्टि के स्तर पर पड़ने वाले प्रभाव की, तो समझ लें कि शुरुआत में तो यह बेशक अच्छा लगेगा, पर इससे एकरसता भी आ सकती है। मनोविज्ञान कहता है कि विविधता से संतुष्टि आती है। अगर आप उच्च स्तरीय संतुष्टि को खोज रहे हैं, तो इसका एकमात्र स्रोत भोजन को न बनाएं। भोजन उसका एक अंग हो सकता है, पर असल संतुष्टि तो व्यक्ति के माइंडसेट पर ही निर्भर करती है।
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- Source: www.amarujala.com
- Published: May 03, 2026, 02:50 IST
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