अराजकता की कोई दिशा नहीं होती: सत्ता परिवर्तन के प्रयासों से अस्थिरता और अप्रत्याशित संघर्ष, क्या ऐसा चाहेंगे?
आजकल अराजकता और सत्ता परिवर्तन जैसे शब्द खूब चर्चा में हैं। मजे की बात यह है कि प्रदर्शन करने वालों से लेकर उन्हें देखने वालों तक, अधिकांश लोग यह तक नहीं समझते कि इन शब्दों का वास्तविक अर्थ क्या है। अगर आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, तो अराजकता की भी कोई दिशा नहीं होती। यह भीड़ होती है। अब यह लोकतंत्र की जगह भीड़तंत्र को स्थापित करने की कोशिश कर रही है। इसे सड़कतंत्र भी कह सकते हैं, जहां सड़कों से ही शासन चलाने का दावा किया जाता है। अराजकता के समर्थक और अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने एक चौंकाने वाला बयान देते हुए कहा, हम सब सत्ता परिवर्तन के लिए निकले हैं। इसी तरह, एक युवा नेत्री कहती हैं, बांग्लादेश में जो हुआ, उससे मैं प्रेरित हूं। हाल के दिनों में वहां सत्ता परिवर्तन का एक उदाहरण देखने को मिला, जहां खून-खराबे के बीच अराजकता के कारण सरकार गिरा दी गई। लगातार विरोध प्रदर्शनों में शामिल रहने वाले, संभवतः पेशेवर प्रदर्शनकारी, योगेंद्र यादव ने कहा, भारत में लोकतंत्र का भविष्य संसद या चुनावों के माध्यम से नहीं, बल्कि सड़कों पर तय होगा। यदि आप इनमें से किसी से पूछें कि उनका अंतिम लक्ष्य क्या है, वे देश को कहां ले जाना चाहते हैं और उनके कथित सत्ता परिवर्तन के बाद जीवन कैसा होगा, तो उनके पास कोई जवाब नहीं होगा। ऐसा लगता है कि भारतवर्ष में अधिकांश लोगों के पास पर्याप्त खाली समय है। किसी बस स्टॉप, हवाईअड्डे के प्रतीक्षालय, रेलवे स्टेशन, मॉल, सड़क किनारे चाय की दुकान या अपनी पसंद की किसी भी जगह पर नजर डालिए। दस में से आठ लोग मोबाइल फोन में डूबे मिलेंगे। यह एक महामारी, एक तरह की मानसिक बीमारी बन चुका है। भीड़तंत्र को बढ़ावा देने के लिए इस माध्यम का भरपूर इस्तेमाल किया जा रहा है। द ग्रेट गैट्सबी वर्ष 1925 में लिखा गया उपन्यास है। यह अमेरिकी सपने, भौतिकवाद और जैज युग के नैतिक खोखलेपन की एक त्रासद आलोचना प्रस्तुत करता है। इसे लिखे हुए सौ वर्ष से ज्यादा हो चुके हैं। आज भारत भी कुछ इसी तरह की परिस्थितियों का सामना कर रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी या सीजेपी नाम से पुकारा जाने वाला समूह कुछ लड़के-लड़कियों और पुरुषों-महिलाओं का एक मामूली-सा जमावड़ा है। कई लोग उन्हें राष्ट्रविरोधी उपद्रवी कहते हैं। इस समूह ने नीट परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होने के विरोध में प्रदर्शन शुरू किया था। इसने राजधानी दिल्ली में अराजकता पैदा की और निर्वाचित सरकार के खिलाफ बेहद अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। इसके बाद यह दलील दी गई कि यह छात्रों का विरोध प्रदर्शन था और इस आधार पर इन्हें अदालतों से लगभग राहत मिल गई। ये लोग अपने मुद्दे और मांगें पलक झपकते ही बदल लेते हैं, ताकि विरोध की आग हमेशा सुलगती रहे। अचानक इन्होंने निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाने शुरू कर दिए और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग करते हुए उन पर वोट चोरी के आरोप लगाए। इसे विदेशी मीडिया और विदेशी धन के समर्थन से चलाया जा रहा विरोध प्रदर्शन माना जा रहा है। इसके पीछे का तर्क स्पष्ट है कि भारत जिस तेज गति से आगे बढ़ रहा है, उससे पश्चिमी शक्तियां खुश नहीं हैं और वे देश की प्रगति को अस्थिर करना चाहती हैं। हालांकि, ये विरोध प्रदर्शन सुनियोजित तरीके से और मुख्य रूप से बड़े शहरों तक सीमित दिखाई देते हैं, फिर भी इन्होंने लोगों की कल्पनाशक्ति को प्रभावित किया है। हालांकि, इस प्रभाव का वास्तविक महत्व कितना है, यह देखने वाली बात होगी। बहुसंख्यक लोगों का समर्थन इन्हें हासिल नहीं है। केवल हताश राजनीतिक दल और मुफ्त की सुविधाओं के आदी लोग शोर मचा रहे हैं। हताश विपक्ष, डॉलर से भरी जेबों के साथ विदेश से आ धमकने वाले लोग और वामपंथी समर्थन प्राप्त कुछ आंदोलनकारी विद्यार्थी-इन सबका मेल एक खतरनाक स्थिति पैदा करता है। ऐसे में, सवाल यह है कि आखिर सरकार इन पर कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं करती। दरअसल, यही वह चीज है, जिसकी ये लोग और विदेश में बैठे इनके कथित संचालक चाहत रखते हैं। प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और यहां तक कि न्यायपालिका के खिलाफ अर्धनग्न लड़कियों द्वारा इतनी अभद्र भाषा का इस्तेमाल किए जाने के बावजूद यदि दुनिया तानाशाही का माहौल बताती है, तो फिर चीन के बीजिंग स्थित थियानमेन चौक पर 1989 में हुए विरोध प्रदर्शनों को क्या कहा जाएगा विभिन्न अनुमानों के अनुसार, उन विरोध प्रदर्शनों में तीन सौ से लेकर दस हजार से भी अधिक लोगों की जान गई थी। अगर सरकार हथौड़ा चलाने लगे, तो यही लोग जोर-शोर से चिल्लाएंगे कि सरकार अहंकारी हो गई है और सत्ता उनके सिर चढ़कर बोल रही है। सरकार के लिए कठोर कार्रवाई करना सबसे आसान रास्ता हो सकता है, लेकिन इतनी उकसाहट के बावजूद संयम बनाए रखना भी सराहनीय है। इस लेख का उद्देश्य यह है कि पाठकों के सामने एक व्यापक तस्वीर रखी जा सके। याद रखिए, सरकार अकेले यह काम नहीं कर सकती। इसके लिए नागरिकों की भागीदारी भी आवश्यक है। यदि आप उपद्रवियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकते, तो कम से कम उनका समर्थन न करें। इसके बजाय, विधिवत निर्वाचित सरकार के साथ मजबूती से खड़े रहें, जिसने पिछले बारह वर्षों में परिणाम दिए हैं। यही बात उपद्रवियों को सबसे ज्यादा परेशान करती है। जब कोई देश अराजकता और सत्ता परिवर्तन के प्रयासों की चपेट में आता है, तो आम तौर पर वहां भीषण अस्थिरता, व्यवस्थागत विघटन और सत्ता के अप्रत्याशित संघर्ष का दौर शुरू हो जाता है। दिवंगत चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत ने कहा था कि भारतीय सेना को ढाई मोर्चों पर युद्ध लड़ने के लिए तैयार रहना चाहिए। इसका आशय एक साथ बाहरी और आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने से था। वास्तव में, पूरे देश को इसके लिए तैयार रहना चाहिए। फिलहाल, ऐसा ही परिदृश्य दिखाई दे रहा है और भविष्य में भी इस तरह के प्रयास बार-बार हो सकते हैं। क्या आप कभी ऐसी स्थिति में रहना चाहेंगे इस सवाल का ईमानदारी से जवाब दीजिए, आपको अपने प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा। जनादेश की तलाश करने वालों के लिए असली महत्व उन लोगों का है, जो अपने मताधिकार का इस्तेमाल करते हैं; न कि उनका, जो अराजकता फैलाना चाहते हैं।
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Oct 21, 2026, 04:55 IST
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