सस्पेंस और बौद्धिकता का अद्भुत मेल है पीयूष पांडे का उपन्यास  'उसने बुलाया था'

सस्पेंस-थ्रिलर जैसी अत्यंत जटिल विधा को चुनना अपने आप में एक बड़ा जोखिम है, ये जोखिम पीयूष पांडे ने अपने उपन्यास 'उसने बुलाया था' में अच्छे ढंग से उठाया है, कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है वैसे- वैसे जितना पाठकों को आकर्षित करती है उतना ही रहस्यों में उलझती जाती है, और यही जोखिम इस कहानी को उपन्यास में बदल देता है। 'उसने बुलाया था' की भाषा, कहानी कहने का ढंग इतना सरल और संप्रेषणीय है कि जैसे जैसे आप पढ़ते जाएंगे मन मस्तिष्क में कथा-चित्र उभरते जाएंगे। आप कहानी के साथ-साथ जैसे यात्रा कर रहे हों या यह कि मौका-ए-वारदात आप भी उस विशेष क्षेत्र के हिस्सा हों और नुक्कड़, चौपाल, गली चौराहों पर इसी चर्चा में शामिल हों। कथा सिर्फ घटनाओं के स्तर आगे नहीं बढ़ती बल्कि उसके समानांतर चलता संक्षिप्त और रोचक ज्ञान-संसार कहानी के प्रवाह के साथ-साथ पाठक को मानवीय व्यवहार के अनेक मनोवैज्ञानिक पहलुओं से भी परिचित कराता है। समीक्षा में कहानी पर ज्यादा बातचीत नहीं की जा सकती लेकिन कुछ चीजें ऐसी हैं जिनका जिक्र किए बगैर आगे बढ़ना मुश्किल है। कुछ-कुछ घटनाएं ऐसी हैं कि उसे पढ़ते हुए मन में और कई कहानियां और ऐतिहासिक घटनाएं घूम गईं। कहानी की पात्र प्रज्ञा अमेरिका से लौटी तो पीएचडी के लिए अनोखे मनोवैज्ञानिक प्रयोग पर काम शुरू की, जिसमें किसी पुरुष का नशे की स्थिति में किसी स्त्री के साथ मित्रवत बातचीत में मानवीय व्यवहार कैसे बदलता है, सामान्य सामजिक जीवन में कई तरह के नैतिक लबादे से लदा हुआ इंसान अंदर से कितना खोखला और खतरनाक हो सकता है, उसके अवचेतन में एकत्रित न जाने कितनी कुंठाएं और दमित इच्छाएं कुलांचे मारने लगें, यह सबकुछ देखने को मिलेगा।

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Apr 04, 2026, 20:30 IST
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