तमिलनाडु में बदला सियासी मिजाज: छह दशकों में पहली बार उभरी एकदम नई राजनीतिक शक्ति, एमजीआर के बाद पहला बदलाव
तमिलनाडु के नतीजों से साफ है कि राज्य का मिजाज दो बातों से तय हुआ। एक आधी सदी से चली आ रही परंपरागत राजनीतिक विरासत के बाद एक नए चेहरे की चाहत और दूसरा, सत्ताधारी व्यवस्था के प्रति तिरस्कार का भाव, जिसे आलोचकों की नजर में अब संकीर्ण, वंशवादी और कभी-कभी राजनीतिक रूप से आत्मसंतुष्ट माना जाने लगा है। राज्य में संभवत: छह दशकों में पहली बार कोई नई राजनीतिक शक्ति उभरी है। यह न तो कोई गुट है, न ही कोई अलग हुआ हिस्सा और न ही जानी-पहचानी द्रविड़ व्यवस्था का नया रूप। बल्कि यह ऐसा कुछ है, जो उस व्यवस्था को पूरी तरह से बदल देने के करीब है। पिछली बार यह बदलाव एमजी रामचंद्रन के द्रमुक से अलग होने पर हुआ था। उस समय उन्होंने लोगों की फिल्मी दीवानगी को अपनी राजनीतिक ताकत में बदल दिया था। वह क्षण भी असल में पुरानी योजना की ही देन था। सीएन अन्नादुरई और द्रमुक ने थिएटर और सिनेमा को जन-राजनीतिक संचार के माध्यमों में बदलने में दशकों बिता दिए थे और एक ऐसा तंत्र तैयार कर दिया था, जहां परदे से राजनीति की बातें पूरी रवानगी के साथ होती थीं। विजय भी अब उस व्यवस्था में दाखिल हो चुके हैं, पर इस व्यवस्था के अंदर विकसित हुए बिना। यही बात इस क्षण को सबसे अलग बनाती है। केरलम में सत्ता विरोधी लहर के विपरीत तमिलनाडु का मिजाज अलग परिचय दे रहा है। यह कोई पारंपरिक सरकार विरोधी लहर नहीं है। यह कुछ ऐसा है, जो दूरगामी असर वाला है, यह भावनात्मक निष्ठाओं का पुनर्विन्यास है। टीवीके ने इस भावना को भुनाया है। टीवीके के उभार का दायरा व्यापक है। इसमें चेन्नई जैसे शहरी केंद्र भी शामिल हैं। टीवीके के उभार ने चुनावी मुकाबले की शर्तों को पहले ही बदल दिया है। अलग तरह की राजनीतिक एंट्री तमिलनाडु की राजनीति में फिल्मी सितारे हमेशा से रहे हैं, लेकिन उन्होंने एक खास पैटर्न का पालन किया। अन्नादुरई और करुणानिधि ने सिनेमा का इस्तेमाल अपनी विचारधारा को गढ़ने के लिए किया। एमजीआर ने उसी वैचारिक आधार का इस्तेमाल कर पार्टी बनाई। जयललिता को वह ढांचा विरासत में मिला और उन्होंने उसे और मजबूत किया। बाद में आए लोग भी उसी व्याकरण के दायरे में रहकर या उसके खिलाफ काम करते रहे। विजय का उदय किसी वैचारिक प्रशिक्षण या लंबी राजनीतिक दीक्षा पर आधारित नहीं है। यह उनके दर्शकों के साथ सीधे, लगभग बिना किसी मध्यस्थ के बने रिश्ते पर आधारित है। यह काडर की राजनीति नहीं है। यह चरित्र की राजनीति है। विजय के समर्थक हमेशा नीति या विचारधारा की भाषा नहीं बोलते। वह जानी-पहचानी भाषा बोलते हैं, फिल्मों की, संवादों की और उस इंसान की जिसे वे दशकों से देखते आ रहे हैं। इस लिहाज से, यह शायद सिनेमा का राजनीति में वह सबसे शुद्ध रूपांतरण है, जो तमिलनाडु ने अब तक देखा है। परंपरागत व्यवस्था के खिलाफ वोट अगर विजय का उभार कहानी का एक पहलू है, तो दूसरा पहलू स्थापित परंपरागत व्यवस्था से उपजी ऊब भी है। चुनाव में द्रमुक की आलोचना अक्सर राजनीतिक परिवार के अंदर सत्ता के केंद्रीकरण की धारणा और नेतृत्व परिवर्तन को लेकर व्याप्त बेचैनी पर केंद्रित रही है। युवा नेतृत्व की एक नई पीढ़ी को आगे बढ़ाए जाने (विशेष रूप से उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन को) ने लोगों का ध्यान खींचा है। कुछ हलकों में उनके राजनीतिक अनुभव और तैयारी को लेकर संदेह भी प्रकट किया जा रहा है। ऐसे मौके भी आए, जब बयानबाजी को लेकर विवाद खड़ा हुआ है, जिसे विरोधियों ने और हवा देकर आस्था और जनभावना से जुड़े मामलों पर निर्णय और संवेदनशीलता पर सवाल उठाए हैं। इनमें से कोई भी बात अपने आप में, सत्ता-विरोधी लहर का निर्णायक रूप नहीं लेती। लेकिन जब इन सभी बातों को एक साथ देखा जाता है तो ऐसा लगता है कि इन्होंने एक ऐसे माहौल को बनाने में योगदान दिया है, जहां मतदाताओं का एक वर्ग दो प्रमुख द्रविड़ गुटों से परे देखने को तैयार है। एमजीआर व विजय की तुलना बेमानी तमिलनाडु की सियासत में फिल्मी हस्तियों का दबदबा रहा है। चाहे वह एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) या फिर जयललिता, विजय से इनकी तुलना बेमानी होगी। एमजीआर भले ही अपने पहले ही चुनाव में सत्ता में आए थे, लेकिन वह बहुत पहले से राजनीति में सक्रिय थे। वहीं, विजय ने पार्टी की स्थापना के दो साल के भीतर ही राजनीतिक सफलता हासिल की। एमजीआर ने द्रमुक से अलग होकर 1972 में अन्नाद्रमुक की स्थापना की थी और 1977 में अपने पहले चुनाव में सत्ता में आए। वे द्रमुक के कोषाध्यक्ष थे, जब उन्हें करुणानिधि के नेतृत्व वाले गुट ने पार्टी से निष्कासित कर दिया था। जयललिता भी एमजीआर के साथ लंबे समय से राजनीति में सक्रिय रही और उनके निधन के बाद सत्ता में आईं। अन्य वीडियो-
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- Source: www.amarujala.com
- Published: May 05, 2026, 03:31 IST
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